कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी शुक्रवार को बिहार दौरे पर आ रही हैं। वो पहले प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय सदाकत आश्रम में महिलाओं से संवाद करेंगी फिर वो पूर्वी चंपारण के जिला मुख्यालय मोतिहारी के गांधी मैदान में एक जनसभा को संबोधित करेंगी। प्रियंका के इस दौरे को लेकर पूरी पार्टी में जोश है। एआईसीसी के महासचिव सैय्यद नासिर हुसैन इसे लेकर मीडिया से मुखातिब हुए और उनके कार्यक्रमों के बारे में तफ़सील से जानकारी दी। नासिर हुसैन ने बताया कि शुक्रवार की सुबह सदाकत आश्रम में प्रियंका गांधी घरेलू महिलाओं, मनरेगा कार्यकर्ताओं और जीविका दीदियों के अलावे आशा वर्करों के साथ भी सीधा संवाद करेंगी। जिसके बाद प्रियंका का काफिला मोतिहारी के लिए कूच कर जाएगा।

प्रियंका के इस दौरे को महिला मतदाताओं को कांग्रेस की ओर आकृष्ट करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। सालों अमेठी और रायबरेली तक खुद को महदूद रखने वाली प्रियंका गांधी ने पिछली बार यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। लड़की हूं, लड़ सकती हूं के स्लोगन के साथ वहां भी महिला मतदाताओं को मोहने की कोशिश की गई थी। लेकिन बात बिहार की करें तो यहां आधी आबादी को नीतीश कुमार के सम्मोहन से निकाल पाना बेहद चुनौती भरा टास्क है। नीतीश सरकार की योजनाओं और शराबबंदी ने उन्हें सुशासन बाबू का इस कदर मुरीद बना रखा है कि बिहार की महिलाओं को नीतीश के साइलेंट वोटर के तौर पर देखा जाता है। माना जाता है कि जाति और संप्रदाय से उपर उठ कर महिलाएं नीतीश कुमार के लिए वोट करती रही हैं। अब नीतीश के इस पुख्ता किले में सेंधमारी की जिम्मेदारी प्रियंका गांधी को दी जा रही है। 
प्रियंका के मोतिहारी दौरे को भी चुनावी चश्मे से देखा जाए तोे एक बात साफ हो जाती है कि पूरे चंपारण में दुर्गति को प्राप्त पार्टी को यहां प्रियंका के रुप में एक तारणहार दिखाई पड़ रहा है। कभी कांग्रेस के गढ़ रहे चंपारण से अब जैसे पार्टी की पूरी विदाई हो चुकी है।कांग्रेस ही क्यों पिछले विधानसभा चुनाव में तो पूरे महागठबंधन को पूर्वी और पश्चिमी चंपारण में निराशा ही हाथ लगी। पूर्वी चंपारण की 12 और पश्चिमी चंपारण की 9 विधानसभा सीटों को मिलाकर पूरे चंपारण से कुल 21 सीटें होती हैं। इनमें से पश्चिमी चंपारण से 8 और पूर्वी से 9 सीटों पर एनडीए का कब्जा है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पश्चिमी चंपारण के बगहा, नौतन, चनपटिया और बेतिया जबकि पूर्वी चंपारण के रक्सौल और गोविंदगंज से चुनाव मैदान में उतरी, लेकिन इन छह की छह सीटों पर उसे शिकस्त का सामना करना पड़ा। कभी गांधी की प्रयोगशाला रहे चंपारण में कांग्रेस मुंह के बल गिरी। अपनी इसी दुर्गति से निजात पाने के लिए पार्टी अब ‘गांधी’ की बांट जोह रही है।

कांग्रेस बिहार में अपनी खोई ज़मीन को दोबारा पाने के लिए बेताब दिख रही है। उसे एहसास होने लगा है कि आरजेडी की पिछलग्गू बनकर उसने यहां क्या खोया है। पार्टी के अंदरखाने से जो खबरें आ रही हैं उसके मुताबिक इस बार किसी भी कीमत पर कांग्रेस 70 से कम सीटों पर नहीं मानने वाली। अगर गठबंधन को मंजूर हुआ तो ठीक नहीं तो पार्टी एकला चलो का फार्मूला भी अपना सकती है। राहुल का 15 दिनों के बिहार प्रवास ने कांग्रेसियों में एक उम्मीद जगाई है। वोटर अधिकार यात्रा के दौरान सड़कों पर उमड़े जनसैलाब ने कांग्रेस में नई उर्जा का संचार किया है। यहीं वजह है कि CWC की बैठक आज़ादी के बाद पहली बार पटना की धरती पर बुलाई गई और इसमें एकस्वर से पूरे दमखम से बिहार चुनाव में उतरने का प्रस्ताव पास हुआ। पार्टी को उम्मीद है कि बिहार में प्रियंका की मौजूदगी उसके मंजिल की राह आसान कर सकती है।







